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Tuesday, February 11, 2014

इमरती मौसी ...

तो कथा यूँ निकली की सूत जी कहते हैं..की आखिरी अध्याय भी मन लगा कर अगर सुन लिया जाए तो भरसक कल्याण ही होता हैं ...

भीड़ के पिछले लाइन में बैठी इमरती मौसी ओघाती सी जाग गई..अब हाथ में अक्षत दूब लिए सजग हो के बैठ गई ..आखिरी अध्याय पूरा सुनना है आज.....

इमरती मौसी के जिनगी में सत्न्रायण भगवान की पूजा का आलम ऐसा की मुहल्ला टोला जहाँ से भी शंख बजने की आवाज सुनी नही की भाग पड़ी साड़ी सम्भारती..आखिरी अध्याय पर मन का मुराद जो पूरा हो जाए की गारंटी ....मौसी के दुःख की कहानी इतनी पुरानी की की बात अब सांत्वना से ज्यादा हंसने की हो गई थी ..मुहल्ले के बच्चे तक चिढाने लगे अरे मौसी बड़का टोला में पूजा शुरू होने वाला है ..कहो मौसी आज आँख खोले रहू की नाही पूजा मा...मौसी आखिरी अध्याय तक जागत रहिया..तोहार मुराद पूरा होई जाई..सूत जी कहत रहें.....पीछे फब्तियां खिलखिलाहटें .....

चकरघिन्नी सी इमरती मौसी दूब अक्षत चुटकी में पकड़े सच पागल के जैसे भागती रही ..घर वापस आते हहरा कर गिर जाती अपनी खटिया पर ..मटमैले तकिया के नीचे से हाल्फ निकर पहनी एक पीली पड़ गई तस्वीर निकालती कलेजे पे ओढती और आँख बंद कर बडबडाती ..बरसोंसे रो रही आँखों में भी पानी ना कम हुआ .

.इकल्ली पड़ी रहती घर में ..तेल मालिश का काम करती....सभी नवजात को ऐसे हसरत से देखती जैसे उनका मुन्ना हो .....इन बेगानी मुस्कराहट में इमरती मौसी ने अपनी जिंदगी तलाश ली थी ..मुहल्ले के सभी सौरी का काम यही संभालती ..टुकुर मुकुर आँखों से निहाल करते से बच्चे ..मौसी की ममता आसमान ...आँचल में तरह तरह का तेल महकता उबटन से आज ही मली गई नन्ही सी बच्ची की कोमल देह बसी सी होती ..मुठ्ठी भर लाल मिर्चा लेकर कभी ई बच्चा कभी उ बचवा का नजर उतरती मौसी निहाल हुई घुमती रहती मुहल्ला मुहल्ला.......

अकेले घर की दीवारों से टिक कर मौसी कलेंडर में टंगे भगवान् को खूब खरी खोटी सुनाती ..छाती सूख गई ..कलेजा मुंह को आ जाता की कैसे पाँच बरस का बेटा गंगा नहाने गई मौसी के आँख झपकते ही ऐसा ओझिल हुआ की कभी ना दिखा ..आह ..

हवा से तेज भागी रही मौसी ...सौ सौ आँख लगाकर चारो तरफ खोजा शीतला मैया के सीढि पर माथा पटकती रही ..जिंदगी का एकही सहारा है मैया रानी..ऐसा नाही कर सकती......कहते हैं उस शाम मौसी की चीख से डरता सा अँधेरा देर से उतरा..गंगा उदास सी बही.... किसी घर से नही आई लोरी की आवाज ..बच्चे चिहुकते रहे .....

मौसी को बेहोशी की हालत में घर लाया गया ..कुछ दिन बीते ..पर दर्द ना बीता.......जमीन पर लाश सी पड़ी रहती है मौसी की ....

आती है शंख की आवाज..अरे बुढा भागो अक्षत दूब लेकर... पूजा शुरू होवेवाला है...तोहार लरिका मिल जाई ......मौसी के अचरा में तेल महक रहा है मौसी भाग रही है ..और मुन्ना...............................अचरा फैला के मांग रही है मौसी अपना मुन्ना...हथेली में चटचटा रहा सत्नारण पूजा का चरणामृत ...
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Tuesday, December 3, 2013

लागा झुलनियाँ क धक्का ...

कभी तुमपे कभी हालात पे रोना आया..बात निकली तो हर एक बात पे रोना आया ...

बाभन टोला के छत से आसमान जरा नजदीक दिखाई देता ...बड़ी दूर नाच की आवाज हवा में तैरती सी छत पर रुक जाती..."लागा झुलनियाँ क धक्का बलम कलकत्ता पहुच गए "बुआ देर रात तक जागती दूर से आ रही मध्धिम पड़ती रोशनी की एक डोर उनतक पहुचती..बुआ वही थामे ना जाने कौन दुनियां में विचरती..बुदबुदाती ..अपने लम्बे बालों में कटोरी भर तेल मलती ..और बिखरी सी सो जाती ...

सबकी लाडली रहीं बुआ ..जो मांगती आ जाता ..शहर से आया कपडा सिलाती..ऊँची एडी का चप्पल भी मंगावती शहर से ..नये फैशन का बैग ..और रेशम के पक्के रंगों का धागा... ....अब गाँव में लड़की के बड़े हो जाने का अपना पुराना तर्क हुआ करता ...शादी की सुगबुग पढाई का छुडवा दिया जाना..लड़के की तलाश ..घर का रंगरोगन ..और उस लड़की की विदाई जो अभी चहकती सी आपके आँगन में फर्गुदियाँ सी उछलती कूदती रही ...

बीस साल बड़े रहे अवधेश फूफा ...घर के बड़े ..अपना पक्का घर ..इकलौती संतान ..बड़ी मूंछ..तगड़ी काठी ..और इधर इत्ती सी जान की बुआ ..बिना किसी विरोध शादी हो गई ..बुआ के फ़िल्मी दुनियां वाली ढेरों पत्रिका पड़ी की पड़ी रह गई..जिसमे देखती रही बुआ अपना हीरो सा राजकुमार ...

हम बच्चे थे तब जब आँगन में अपनी पियरी में बुआ शादी के पीढ़े पर बैठी ..आँगन की सारी औरते फुसफुसाती सी कहती रही..बाप सामान दूल्हा खोज लाये बाबा ..घुघट की ओट से बुआ भी अपने दूल्हा को देख सकपका गई थी..बलि का बकरा ..मेरे गाँव की ये सबसे दुखद शादी थी ...जब पहली विदाई पर बुआ ने अपना विरोध जताया ..किसी ने उनकी नही सुनी..अगली साईंत आने तक बुआ चादर तकिया में फूल काढती रही..रोज शंकर जी को जल चढाती रही..कुआँ पर बैठकर घंटों अपनी सखियों को अपना दुखड़ा सुनाती..सारा दिन इधर उधर के घरों में जा के कॉपी भर गाना लिखती रहती..बन्ना बन्नी सोहर कजरी..चैता ..

विदाई का साईंत बन गया तारीख सुना दी ठाकुर मंदिर के पुजारी ने ..बुआ का झांपी सजाया जाने लगा..हल्दी लगाने वाली नाउन रोज़ आने लगी ...बुआ को जैसे बिच्छू घास छू गया...बड़ी बड़ी आँखों में दूर दूर तक सुखा पडा रहता ..गाने की कॉपी में आखिरी पन्नो पर विदाई गीत लिखती बुआ अपने खटिया से लग के रो पड़ती..अम्मा का आँखें क पुतरिया..भैया से जल्दी बुलाने की गुहार ..बाबा से आम का पेड़ मत काटने की मिन्नत करती बुआ.

.बैलगाड़ी पर एक कोने में सिसकती गाँव के उसी रास्ते से विदा हो रही थी..जिसपर अपना दुपट्टा फहराती अपनी सखियों के साथ खेत में मटर तोड़ती..कैरी खाती ..और नचनियां के याद किये गाने पर ठुमका लगाती ..."लागा झूलानिया क धक्का बलम कलकत्ता पहुच गये
'
'..तेज खिलखिलाहट ...तेज रौशनी की किरण..उसकी डोरी थामे बुआ ..सारी रात जागती सी क्या बोलती थी...कोई कभी ना जाना ..बुआ के पेट पर लेटे बैठे हम खेलते रहे घुघुवा मामा उपजे धामा....हम अनजान थे बुआ ..कभी नही समझ पाए ..तुम वो राजा रानी की कहानी में उस बिचारी राजकुमारी का जीकर आते क्यों मन भींगा लेती..वो तुम ही थी ना ??

Monday, October 7, 2013

करीमा...माफ़ कर दे

चलिए करीमा के साथ... हमारे ही गाँव के उत्तर में उसका घर है ..घर क्या चार जर्जर दिवारों का एक ढांचा ...उसी में रहता है करीमा ..और सच जानिये तो रहता ही कहाँ है ...सारा दिन तो गाँव के लोगों की सेवा टहल में बीत जाता है समय ...मुंह अँधेरे घास की मशीन से चर्र मर्र की आवाजों के साथ उसका आगमन हो जाता है ....

पर कहानी बस हम तक सिमित है ..करीमा हमारे लिए जादूगर था ..उसके पास तरह तरह के गाने थे ..हमरा के जानी ना सिपाही जी ...ए दुल्हिन सपना में केकरा से भेटेलु......और हम सब का फेवरेट गाना ...ए डागदर बाबू बेमार भैल बकरी ...बस इस गाने को गाते गाते करीमा गाँव के अहर डहर के रास्ते हमें पूरा गाँव घुमाता..हम पूरी भक्ति से उसके पीछे ये गाना जोर जोर से गाते ..बगीचे की सबसे ऊँची डाली पर पत्तो के पीछे छुपा है एक पका आम करीम सरपट ऊपर ..हमारे मुंह में आम के रस निचोड़ता..हमारी पेंसिल को अपने पास रखे तेज छुरी से एकदम नुकीला बना देता ..हमारी चोटी कस के बाँध देता ..जल्दी से सबके हाथ मुंह धुला देता .

.तब कुवें पर बाल्टी डोरी सब आने जाने वालों का प्यास बुझाती ...एक लोटा में मुंह लगा कर जोर से अपना नाम गोहराता..हमें बताता सौ सौ लोगों की आवाजें पुकारती हैं उसे पलट कर ...सब जादू ना करीमा ?चाची लोगों की सतरंगी टिकुली के लिए वही लाता गोंद ना जाने कौन से पेड़ से इकठ्ठा कर के ....बाबा के गमछे को धोती को इस पेड़ से उस पेड़ में बांधकर पल भर में सुखा लाता..जादू ना करीमा?

पर गाँव के चौपाल पर जब बच्चा चाचा निर्गुण गाते करीमा रो रो के हलकान हुआ जाता ..जब रामायण के बनवास को पंडित जी बांचते करीमा बेचैन हो जाता ....हमे तो कभी ना समझ में आया करीमा की जिंदगी में कोई तकलीफ भी है ..हमेशा दूसरों के लिए काम करते रहने वाला करीमा अनाथ है ..बाबा ने बताया ..माँ बाप बचपने में ही मर गये ..छोटा जात ..इधर उधर काम टहल करते रहता है ...उसके एकांत की पगडंडियों पर हमारा बचपन भागता था ..हमारी आवाजों की पुकार में वो सारे रिश्ते जी लेता .

.अब देर रात अपने घर की दीवारों के बीच अजोरिया रात में वो अपने पैरों में पड़ी दरारों को मोम से भरता ...ना जाने कितनी चाचियों ने सटा के लगा ली अपनी टिकुली ..बच्चों ने जोर जोर से गाये उसके गाने ..घास की चर्र मर्र के अलार्म से उठा करती नई दुलहिनें ...कोहड़ा के लतर सा छाया रहा करीमा बाबा के खपरैल पर ...एकदम से उसके मरने की खबर आई ..गाँव के उत्तर टोला के कुवां में लाश मिली ..करीमा था ....

मुझे लगा मैं जानती थी उसके मरने का कारण ..पहले क्यों ना बता दिया ...ये कैसा अपराधबोध दे गया करीमा ..तू कुवां पर रात काहे गया मुझे पता है ...तूने अपने नाम की आवाज लगाईं ना ..और उन हज़ार हज़ार आवाजों ने पलट कर तुझे पुकारा ..तू चला गया उनके पास .....

किनारे एक लोटा लुढका पड़ा हवा से इधर उधर डोल रहा है ..अन्दर से चीख पुकार मची है ..अकेलापन अकेले ही मारता है हमें ..अनजान आवाजों में अपनों की खोज ..समय इशारे क्यों नही करता ?? करीमा तू जादूगर नही था .................माफ़ कर दे ...

मुंह में उसी मीठे आम की चट चट ..एकांत की कहानी ...

Sunday, April 28, 2013

मर्म से मर्म तक ...


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