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Thursday, January 23, 2014

बाबा का गमछा

बाबा बाहर की चौकी पर ध्यान रमा कर बैठते ..मुझे पता था किसी चौपाई पर नही ठहर रहा है उनका मन ..घर में क्या बन रहा..कौन आया..बातें क्या हो रही हैं...चाय बनी थी क्या फिर से...वो इन बातों का जबाब चाहते ..मैं हूँ ना बाबा बन की तितली.इधर उधर सारी बातों का सामान्य गूढ़ पिटारा..मेरे हाथ हमेशा मिटटी से भरे होते..और बाबा की आँख इंतजार से..मेरे पास जाते ही अपने गमछे का एक हिस्सा चौकी पर मेरे लिए बिछा देते ..

अपनी धोती के कोने से मेरा हाथ पोछते फिर अपनी आँख ..का बाबा ?? एगो गीत गइबे...मैया मोरी मैं नही माखन खायो ..अभिनय के साथ ..बाबा विभोर हो मेरा नादान अभिनय देखते..मैं बताती बाबा जब लाल नीला लाइट पड़ता है ना तब कान्हा का मुकुट खूब चमकता है..स्कूल के स्टेज की बात...पर बिना लाइट बाबा की आँख चमकती..उनके गमछे को कमर में बाँध एक छोटा सा लकड़ी उसमे खोंस जब मैं उनकी तरफ फेंकती..ये लो अपनी लकुटी कमरिया..तब बाबा हाथ फैला देते..ऐन्गा ना रिसियाए के बाबू....अब मुस्कराती चौकी पर बाबा ताली बजा कर मेरे गाने को कसम से बेसुरा गाते..बाबा ऐसे नही ऐसे नही...

गमछे ने बाबा का खूब साथ निभाया..कभी बिस्तर बना कभी पगड़ी..कभी कमर में बंधा कभी सर पर..कभी दाना से भरा कभी सब्जी से कभी हम सोये मिलते उसके नीचे ऊपर बाबा की थपकी..गाँव की मिटटी धीरे धीरे झर चुकी थी ..अब कुछ कहानियां बची थी उनके जेहन में वो भी रूठी सी रास्ता विषय सब भूल जाती ..

हमारे बुजर्गों के पास उनके अनुभव की अकूत सम्पत्ति है ..उनकी कहानियां इस लिए भूल जाती है रास्ता की हम सुनते ही नही कभी बैठकर ..की समय नही.बकबक कौन सुने..वही वही बात...हम भी उसी पटरी से अपने उसी उम्र की गाडी से गुजरेंगे..हवा से कोई पुराना गमछा जो पास उड़ आये तो समेट लेना..उसमे कहानियां हैं.भजन है..बाबा की ताली की आवाज है..मिटटी की महक है..और उनकी आँख की रौशनी है..जो धीरे धीरे बहती थी..जिसे बाबा छुप कर पोंछ लेते थे ....

.एकांत में बाबा ने सुनाई थी घर खेत छप्पर अटीदार पाटीदार की कहानी...आज अपने एकांत के पन्नो पर लिखते हुए समझा मैंने.....
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Monday, December 9, 2013

लेखक का एकांत

एक मछली थी ...पानी में फडफडाती सी...रेत पर तडफडाती सी ..जरा सी आँख में डबडब पानी .छोटे से पंख से पानी काटती ..फिसल कर संभलती..संभल कर चलती की फांस ली जाती ..दुखी हो जाती...

पानी का ओर छोर नापना था...उस कम्बखत डोर से बचना था ...अब जान बचे ना बचे ..कोई आखिरी इक्षा है तो बता दे ..मछली बोली उड़ना चाहती हूँ ..जंगल के ठीक ऊपर से ..सुना बड़ा घना होता है ..कोई खो जाए तो मिलता नही ..जानवरों से भरा है..अगर है तो ऐसा ..मुझे उड़ने दो...बचा जंगल रोने लगा ..अतीत की जड़ें भिगोने लगा..मछली की आवाज से सब चकित थे...पहले बस चमकती भर थी..जीने भर को जीती थी..अब बोलने भी लगी...

अच्छा एक बार भरी नदी में डूबना है ..नदियाँ रेत में समां गई रेत हवा के साथ उड़ गया...अब ? एक पूरा नीला आसमान ही दिखा दो ...तकलीफों के बादल छाये थे..कहते है दूर देश से पानी लाये थे..किसानों के आँख से बरसे ..पर हरी भरी धरती को तरसे ..किसी और एरिया ने खरीद लिया था उन्हें...मछली उदास हो गई ...

मछली की बिंधी देह से आसमान उतार लिया गया..उसके आँख की नदी में सूख गये सपने..इंसानी जंगल की भीड़ में तुम जानवर बने ..मछली ने बोलना बंद नही किया..सुना बड़े तेवर है..जख्मी हो तो पानी लाल हो जाता है..पर उम्मीदें आसमानी हैं इसकी ...बची हुई मछलियों को कम करने की होड़ में वो अपनी ताकत गँवा रहे हैं..और इंसानियत का नया इतिहास बना रहे हैं....

.एक मछली थी ...अब बिजली से चलती है..कटोरे भर पानी में ...सब मूक दर्शक....मुरझाये पत्तो का एकांत.. बसंत की आस ...

Sunday, December 1, 2013

लेखक का एकांत

कोई रिश्ता नही मगर फिर भी .......एक तस्वीर लाजमी सी है......

आँखों की नदी ..बाहों की पतवार ..जिंदगी का समन्दर.. ना जाने कितने .भंवर कितने बवंडर ..तुम्हारी चौडी छाती पर टिकी मेरी परेशानियाँ ....

प्यार बंद डब्बे में कपूर सा ...जतन ना करो तो ना जाने कौन सी दिशा में उड़ जाए..बादल बन जाए...हम भींगते हुए भी सूखते रहे ..की पछताती आँखों में एक ग्लानी तैर जाए..ऐसा क्यों किया ??

सुनो आज रात अजीब ख़ामोशी फैली है ना चारो ओर..जरा मेरी पुरानी डायरी देना ....तुम कितने पास ...समय की टिकटिक ..बेफिक्र हवा..पुराने पन्नों से कुछ मीठे वक़्त चुराते हैं..पुरानी कविता पढ़ कर मुस्करा लेते हैं चलो..अच्छा वो आखिरी पन्नों पर तुमने क्या लिखा काटा था..आज तक नही बताया...मेरे उलझते बालों में सुलझती अंगुलियाँ ...

एक छत अतीत हो गई..एक प्यार याद भर..एक डायरी .जिससे होती हुई गुजर जाती हूँ .

.रात बड़ी हो रही ..हर करवट एक सपना बदल जाता है ..पुरानी सूखी पंखुरी का झर झर जाना ...तुम छुईमुई हो..आखिरी पन्ने की मुस्कराहट ...भूला हुआ गाना ...

शाम से आँख में नमी सी है ..आज फिर आपकी कमी सी है........एकांत के बोल ....कभी सुन भी लो ....

Wednesday, November 6, 2013

लेखक का एकांत

अजीब है ना। ।आप खुश हैं कि अचनाक ना जाने कौन से रास्तोँ से चलता हुआ आपका अतीत अचनाक कोहनी मार देता है। .भूल गई क्या ?? हम भी हैं। अब एकांत यूँ भी नही कि आपको एक उदास बुझा हुआ दीया थमा जाए। .पर जो बुझ ही गया मन तो अपने आप को क्यों झुठलाएं अब ऐसा ही है।

और देखो ना फुलझड़ियों से झरने वाला वो चमकदार फूल भी तो अँधेरी सलाखों में कैद हो जाता है तो क्या बचा हाथ में गरमाई हुई काली बेजान तीली। क़ल कि पहनी साड़ी कि तहोँ में यादें सहेज गई। अब रखी रहेगे अलमारी के एक कोने में अगली बार जब पहनेंगे बरबस ही बोल देगा मन पिछली दीवाली को पहनी थी ना। हमे चलते रहना है आगे ..अपनी सोच के साथ नए रास्तों के साथ ..रीती रिवाजों को भी जरा मरा फेर बदल कर निभाते रहना है अतीत कि जुगाली करते रहो कुछ नये स्वाद के साथ बातें याद आती रहती हैं।

कल रात काली थी कितनी ना कि इतनी रोशनी हुई पर मन पर अम्मा छाई रही। वो रात वाला काजल याद आता रहा ..अम्मा कि चुटकियां याद आती रही.. बिना कपूर के काजल के भी लगा आँखे जल रही हैं ..सुबह आईने में आँखें कोरी ही थी ..

अम्मा अब ऐसा तो नही कि अँधेरा साथ ले गई आप हमे बस इन उजालों कि फुलझड़ी थमा दी लो मुस्कराते रहो कुछ बादल पीछे छोड़ गई काला सा जरा सी आँखो में भी भर भर के छायें रहते हैं ...सभी भाई बहनो ने एक दूसरे से एक बात छुपाई कि अम्मा याद आ रही हैं पर सब जान गये और ..पिताजी तुम्हारे कमरे के शुन्य में चुपचाप पुराने हाफ स्वेटर कि वही पुरानी बर्फी वाली डिजाइन को देख कर मीठे हो रहे थे

दीवाली थी न मुह मीठा करना जरुरी है

आसमान के रास्ते हमारे शहर कि सबसे बड़ी खिड़की से मेरी आवाज भागती हुई तुमतक पहुचना चाह रही थी

आपकी आवाज भी आई थी पलट के। खूब घर परिवार सुख से भरल रहे सदा सौभ्यावती का सिंदूर भी चमका हमारी मांग में हाँ हाँ पुराने गहने भी पहने थे हमने तो याद का और तुम्हारा रिशता भी तो ऐसा ही है

पटाखो के तेज़ आवाजों के साथ अपने बच्चोँ का कुनमुनाना तुम देख और सुन सकती हो

बड़ी जिम्मेवारी वाली दीवाली थी जब हम जान गये हैं कि अपनी अंगुली को आग से दीये से कैसे बचाना है अब तुम नही ना हम सब सिख गए

एकांत में टीम टीम करता दीया और मन के फर्श पर तेल सी फैली तुम्हारी याद

Saturday, May 25, 2013

लेखक का एकांत _13

मैं तुमसे मिलना ही नही चाहती के तेवर को तुम समझते और नही आउंगी के सच को झुठलाती दिन के सबसे गरम समय में पैर पटकती उस उपेक्छित तालब की सीढियाँ उतर जाती ..तुम्हारी आँख की मुस्कराहट पानी में खिले एक्का दुक्का उन कमल के फूलों को कुछ और गहरे रंग जाती ..हाँ बोलो क्या बोलना है ? कुछ नही में वो सर हिला देता ..पता था ..नही आउंगी बोल कर मैं आ जाउंगी..कुछ नही बोलना है की चुप्पी को तोड़ने के लिए फिर मैं बात भी करुँगी...तुम्हारे इशारे में तुम्हारी कहानियाँ छुपी होती ..लाल आँखों में गई रात नींद नही आने की शिकायत ..पढ़ाई नही हो पा रही है के शिकन से तुम्हारे माथे पर पड़ता बल ..तुम्हारे चुप रहने से मैं बातें करती ढेरों तमाम ..तुम हाँ हूँ कर सब सुनते ..मेरे कलाई में पड़ी उस लोहे की चूड़ी को घुमाते रहते .

.तालाब का पानी इतना गरम की हाथ सिंक जाए .फिर भी उन बैगनी कमल के फूल की मुस्कराहट को नही चुराता कोई ..हम जितनी देर वहां होते सूखे पत्ते गिरते तेज हवा से तालाब के पानी पर झुर्रियां सी पड़ जाती ...हमें मौसम सिखाते हैं ..वो मेरी गुलाबी हथेलियों को अपने रूखे हाथो में कुछ देर पकड़ कर रखता ..मन के अन्दर के मौसम के बदल जाने का समय होता वो ..तुझे तेज धूप में आना पड़ता है ना मेरे लिए ..गाल तप से जाते ...हाँ तो..अब आगे से नही आउंगी ...बहोत गरमी है ..वो अपने कमीज के निचे रखी एक किताब निकाल कर मुझे देता ..तुम्हारे लिए ....आज ही लाइब्रेरी से ली चार दिन बाद लौटना होगा ...हम्म ..तो चार दिन बाद फिर आउंगी मैं यही ना ..चा..र ....दि.न ...आ जाना ना ................(झुलसाती गरमी में चन्दन सी यादें .. )

Tuesday, May 21, 2013

एकांत में अतीत _12

जब साडी पहननी नही आती तो पहनी क्यों ?मैंने फिसलते प्लेट्स को मचोड कर खोस लिया ..काम वाली बाई भी इससे अच्छा पहन ले ..मेरी निगाहें नीची ..ट्रेन भाग रही थी ..वातानुकूलित डिब्बे में आवाज कम आती है ..मैंने पहली बार उस डिब्बे को अपनी खुली आँखों से अन्दर बैठ कर देखा ..जब हम बच्चे थे तब कैंट सटेशन पर अपनी सादा लाल गाडी का इन्तजार करते हुए जब कभी ये शीशे बंद डिब्बे हमारे सामने रुकते हम उचक कर देखते .कुछ नही दिखता सा दिख जाता ..अम्मा बताती वो विदेशी लोग जाते है ..आज मुझे पहली बार एक विदेशी के साथ उसी बंद डब्बे में बैठाकर भेजा जा रहा है ..बम्बई ..फोटो में देखा था ..सिकुड़ कर एक कोने में हो ली थी ..लम्बे बालों का हेयर बैंड बार बार खुल जाता ..चटक लाल सिंदूर से भरे मांग को वहां लगे शीशे में देखना बड़ा अलग सा लग रहा था ..पर बार बार निहारूंगी तो क्या कहेंगे सब ..फिर मुहं गाड लिया और कादम्बनी देखने लगी ..उल्ट पलट ..हाथ को बार बार खिड़की के शीशे पर रखती ..कोई उपाय नही ..हवा से हाथ नही लड़ा सकती अब..पुड़ी भुजिया खाने की जगह केटरिग से खाना आया ..मुझे आता था खाना खाना पर उस दिन सब गड़बड़ हो रहा था ..पति ने परदा लगा दिया ..बाबा रे ..परदा ट्रेन में ..अब ससुर ने तौलिया बिछा दिया ..मैं लल्लू की तरह सब बात मान रही थी .

.पहली बार मुझे लगा दिमाग नही मेरे पास..मेरा सञ्चालन अब मैं नही कर रही ..बस सांस लेने का काम मेरा ..हे प्रभू ..पांच मीटर की साडी ..अरे कम्बखतों ..कोई तो पुराने कपडे रख देता की बदल लेती ..ये सफ़र बड़ी मुश्किलों से तय हुआ ..और तय ये भी हुआ की मुझे अकेला ना छोड़ा जाए की मैं इधर उधर टहल न लूँ..और कुछ सलवार कुरता खरीद दिया जाए ..दूसरा निर्णय सही था ..अब मैं बम्बई..महानगरी से ...पूरा बम्बई स्टेशन मुझे लेने आया था क्या ..नही नही लोकल की भीड़ है ..मेरी सिड्रेला वाली चप्पल को बर्थ के बड़े निचे से निकालते हुए पति ने घूर के देखा मैं बिछिया ठीक करने लगी ..हाँ तो कई लोग आये थे ..बड़े लोगों के यहाँ के रिवाज में मैं नहा रही थी ..हाई भाभी ..यु आर सो स्वीट ..आसमानी पप्पी और झप्पी ...किसी तरह से इन आतताइयों से छूट कर मुझे कुछ कपडे दिलाते हुए मुझे अपने घर में लाया गया ..ससुर ने कहा मोस्ट वेलकम ..ये अग्रेजी कुछ देर और चली न तो मैं चल दूंगी ..मन में सोचा .

.घर में सभी सामन अपनी जगह पर रखा गया मुझे भी ऐसा करने को कहा गया ..इधर चप्पल..इधर पर्स इधर कपडे ..ये बाथरूम ये रसोई ये बेड रूम यहाँ चाभी रखी जाती है ..उस बंद डिब्बे में विदेशी जाते हैं ..अब मैं बहुत दूर आ गई ..गला भरने लगा ..कहाँ जा कर रो लूँ ..लडकियां कितनी सहज होती है ना जिस माटी में २० साल खेली पलीं बढीं उन्हें जड़ समेत कही और रोप दिया जाता है ..नए बीजों का माटी में खो जाने का जी करता है ..पर नइ उम्मीद नए प्यार के छीटों से वो फिर गहरे जड़ बना लेती हैं ....उनकी उदासियाँ बड़ी बेआवाज होती है ..समझो उन्हें भी ..बंद शीशे के विदेशी डिब्बे से तुमने मुझे बड़ी दूर भेज दिया भाई ..हमारे बचपन की हथेलियों के छापे दिखाई देते है इसपर .जो हम उचक कर लगाते थे ..मैं इसमें जब भी बैठती हूँ सबकी आँखें बचा कर तुम्हारे खाली हाथ पर अपने हाथ रख देती हूँ ...

Sunday, May 12, 2013

एक बेटी का एकांत .9

अम्मा ,

तुम्हारी साड़ी बांटी जा रही थी ..अटीदार पटीदार के लोग घर की बहुवें बेटियां ..वो एक बेरंग समय था अलमारी की चाभी एक वृत्त में झूल गई थी दरवाजे खुले थे तुम जा चुकी थी ..सिन्धोरे में कस के बंधा वो लाल धागा ..तुम कहती ये तागपात का धागा है सिन्धोरे में बाँध कर रखते है..अखंड सौभग्य ..सुहागिनों ने सिंदूर लिया वो अमृत कलश सा भरा रहा बाद तक भी ...तुम्हारे दुनियाभर के भगवान् की छोटी बड़ी मूर्तियाँ कलेंडर पर लिखा तुम्हारा दूध का हिसाब सब अपनी जगह पर था ..बस हम अपनी जगह से हिल गए थे .

.रिवाजों के तेरह दिनों में पिताजी ने कभी नही देखा तुम्हारी फोटो की ओर ..५० साल का साथ उनके मन में कितने बसंत की खुशबू छोड़ गया होगा ..तुम उस बड़े फ्रेम से बाहर हो ..आसमान के बुझेतारे भी जल गए थे उस रोज़ जब अंतिम मंत्रोचार से तुम्हें आखिरी विदा कहा था उन २१ पंडितों के ओज से स्वर के साथ तुम सबको अपने अकवर में ले रही थी ..यूँ तो हमारे जाते समय तुम फेर लेती थी खोइछा का चावल पांच बार ये कह कर की आती रहना ..पर इस विदाई हमने नही डाला वो चावल जो वापस कर कहते तुमसे की आना अम्मा ..

लाल माहवार वाले पैर का छापा बाबा की टूटी मड़ई में था आज पिताजी के विशाल घर के दरवाजे को छोड़े जा रहा था ..जिंदगी का सच यही ..पर झूठ ये की नही हो तुम ..तुलसी के पत्तो पे चिपका है पीला सिंदूर ..तुम्हारे लगाये अमरुद पर कोमल पत्तियां निकली हैं कुछ साड़ियों के रंग से भरा है तुम्हारा बक्सा ..त्योहारों पर बोल पड़ते हैं पिताजी आज कुछ ख़ास बनाया जाए ..भाभी के छम छम में गूंजती है तुम्हारी हंसी .बनारस के रिक्शे पर सवार तुम अभी अभी गई हो गंगा की ओर.......आ जाना हाँ ??? सब कह रहे हैं आज मदर्स डे है .....(व्याही लड़कियों का एकांत बड़ा दुसह होता है अम्मा . )

Thursday, May 9, 2013

एक लेखक का एकांत _7

कागजों पर लिखा सच तीर सा चुभा .पलकें बार बार झपकाई जो पढ़ा क्या सच है? .कागज धुलता रहा अक्षर कुछ और साफ़ दिखने के बजाय बुझने लगे .मंदिर की सीढियों पर बैठ गई .संभल लूँ तो आगे की सोचूं .मिलने के कितने गीत विछोह का मौन रुदन 

.जहाँ लगता है सब ख़तम हो गया सच वही से सब शुरू होता है .मेरी अगुलियों में फसी अंगूठी कुछ कस सी गई है जल्दी निकाल दूंगी .सूना दाग सा पडजाता है .कुछ रंगीन सपनों का साझा मेरी आखों में तैर रहा है वो भी बह जाएगा धीरे धीरे ..बजने वाले फ़ोन के सभी नम्बर अजनबी है .कही तुम्हारा नम्बर भी है रोकने की तमाम कोशिश की मैंने पर एक बार बस तुम्हारी आवाज सुन लूँ का मोह नही त्याग पाई ..यह नम्बर अस्थाई रूप से बंद है ....बड़ा धार था इसमे ..कलेजा कट गया ..

मन में एक जंगल है वीरान बस एक हरा पेड़ है जहाँ मैं और तुम बैठते थे ..तुम्हें पता है प्यार ही बचाएगा इस हरे को कुछ हरी पत्तियां गिर रही है उदास बेआवाज ..मैं अकेला होने से बड़ा डरती हूँ तुम भी जानते थे ..बेजान सी डगर है ..रास्ता भूल रही हु ..हाथ का कागज़ चिंदियों में तब्दील है .

..तुम्हारे भेजे अक्षरों की आग में कविता जल रही है ..कभी सुनना ये कहानी ...पहचनाने वालों में वो पेड़ भी थे जिसपर बंधे धागों में घुमती रही थी धरती गयारह चक्कर ..

Monday, May 6, 2013

एक लेखक का एकांत _6

नदी के सामने रहो ..कुछ ख्याल बहते हैं उसमे .कुछ उदासी गोते लगाती है .दुःख की छटपटाहट उसकी नन्हीं तरंगो में दिखती है .बनारस के घाट की सीढियों पर शाम की भीड़ में अपने लिए चुनी हुई अकेली सीढी पर हम अपनी जिंदगी से हारते जूझते कुछ देर यहाँ बिता देते ..नदी साथ है हम जितनी दूर देखते है रंग दिखाई देते है डोलती डोंगियों से टकराता दीया ..अपना रास्ता चुन लेता है .पांच डूबकी में धुल जाने वाले पाप, दान का पुण्य ,माथे का टिका, ललाट पर दिव्या चन्दन, गोरों की गिटपिट को पछाड़ते मल्लाहों के अल्हड किशोर,

महंगे कैमरों में कैद होती गरीबी.. खाली पड़ी थाली के सिक्के कोढ़ से खो गए हाथ पैरों वाले भिखारी सिंदूरी धोती में गंगा आरती करते गरिमामय पंडित ..आँखें जो देखना चाहती है वो द्रश्य है ..नदी को छूटे हम काँप जाते है या नदी तुम सोचो ..हैरान करते सवालों का जबाब है नदी के पास .अकेलेपन की गहरी उदासी में सोचो तो कहीं भी रहे तुम्हारी आँखें से निकल पड़ती है ..

जीवन औए मरण का संगम है यहाँ .चिताओं की ठंढी पड़ी राख जब नदी में तैरती है आचमन की अंजलि में भर जाती है कुछ अदृश्य उदासी ..तमाम लोगों ने मन्नतों की चुनरी चढ़ाई है ..पर कितने ही बुझ गए तुम्हारी गोद में ..मेरी उदास सीढियों से छप कर टकराती हो तुम ..एक सा दुःख ना ..एक सी उलझन ..बचेंगे तो बहते रहेंगे जिंदगी की रगों में जिंदगी बन ....

Friday, April 19, 2013

एक लेखक का एकांत _5

आज भूख नही ...मन नही खाने का ..अच्छा क्या बना है ?नही नही ये तो बिलकुल नही खाना ...ऐसे सारे नखरे सिर्फ तुम उठाती थी ..कितने विकल्प जोड़ती ..ये खा लो ..एक टुकड़ा खा कर तो देखो ..देखो मामा कौर है इनकार नही करते ..दो मिनट में नमकीन पुडी बना देते हैं ..अचार के साथ खा कर देखना ..

.तुमको क्या हो जाता ..कुछ न कुछ खिला कर ही मानती ..तुम्हारी नाभि से जोड़कर ..अपने को निचोड़कर ..तुमसे हममे सब कुछ चला जाता ..शादी के बाद हम एकदम से औरत बन जाते हैं तुम्हारे जैसे ..अब हम नही कहते की मन नही खाने का ..पता है कही कोई जबाब नही बचा ..कहीं कोई विकल्प नही ..नही कोई खिलायेगा मामा वाला कौर ..

बेटा पढाई कर रहा ..पति नौकरी करने ..मन अनमना हो रहा है ..कुछ खाने का मन नही

..परदे के पिछे छुपी तुम आवाज देती हो ...आज रामनवमी है ..त्यौहार का दिन ऐसा नही करते ...दाल की पुड़ी पसंद है ना ..आओ खिलाते हैं ..

मैं लगातार उस निले परदे के पार झाकने की कोशिश में हूँ ...बादल है ..कुछ दिखाई नही देता ..तुम भी नही ..आवाज का आँचल बार बार ढँक लेता है मुझे ..मेरे मुँह में लगा जूठा खाना पोछकर चली गई तुम ..तुम कभी नही रुकी ..कभी भी नही ना ...

Wednesday, April 17, 2013

एक लेखक का एकांत _4

अचानक आप दोस्त बन जाते हैं .और लगातार आपकी आवाज आस पास बनी रहती है .कभी भी कहीं भी ...क्या कर रही हो ?खाना खा लिया?धूप है बाहर मत जाना ..आज कौन सा रंग पहना ..तुम्हारे शहर में मेला लगा ..भीड में खो जाने का डर तुम्हारे शहर को है ..मैं एक ऐसे रिश्ते के साथ चुपचाप बह रही हूँ..

मेरा दुःख उसका ..मेरे गाने की मिठास से मीठी हो गई उसके सुबह की चाय ..उसे नही पता कई बार कितनी विकट स्थितियों में मैंने उससे बात की ..वजह की वो उदास न हो जाए ..उसने मेरे दुःख में मेरा होकर उपवास रखा ..मेरी मुस्कराहट में भींग कर अपने दिन की शुरुवात की .अब अधिकार से बातें कही जाने लगी ..की तुम्हें नही तो किसे बताऊ ....

मैं लगातार समझ रही हूँ ..तुम्हारा होना ..अपना खोना ..की अचानक ..इस रूट की सभी लाइने व्यस्त है के तर्ज पर ..तुम्हारा शहर दूसरी तरफ रुख कर लेता है .तुम्हारी आवाज दूर से भी नही आती ..अचानक उग आये है तमाम कोमल पौधे तुम्हारे आस पास जिसकी परवरिश करनी है तुम्हें ..मैं धूप में हूँ ..मेरे चुप्पी में टूटती है एक और चुप्पी ..सब बेआवाज ..

मैं वजह जानने की कोशिश में शिकायत करती हूँ ..तुम निर्णय सुनाते हो ...लगातार काम है मेरे पास व्यस्त हूँ ...

मौसम भी दस्तक देकर बदलता है साहेब ..चलो कोई बात नही ..

कुछ लोग पैदा होते है दूसरों का एकांत पाटने के लिए ..दर्द सोखने के लिए ..मेरे गाने में मिठास है .मेरी आँखें खूब छोटी पर गहरी है ...बात में नमक है ..तुमने अपने उदास दिनों में इन्हें चादर की तरह ओढा ..हां अब गर्मी है ..उतार फेकों ..चादरे यू भी ओढ़ी मोड़ी और सुखाई जाती है ..