Thursday, May 22, 2014

कमाल की औरतें _ तीसरी कविता ......

ये औरतें अपनी ख़राब तबियत को टालती हैं 
जितना हो सकता है परशानियाँ पालती हैं 
फिर झल्लाकर कभी उसे महीन चलनी से छानती हैं 
जीतनी छन जाती है उतने से ही घर के काम निपटाने लगती हैं 
जीतनी छन्नी के ऊपर होती है वो अक्सर कुछ स्थूल चीज़े होती हैं 

जैसे उनके मन सपने अपनी बातें दुःख दर्द 
ये उसे घर के कूड़ा कचरे के साथ बाहर वाले घूरे पर डाल आती हैं 

ये कम ही बची रहती हैं
पर काम पुरे करती हैं
औरतें अपने जीवन के सबसे सुन्दर समय में
उठाती है घर की जिम्मेवारी
जनती है बच्चे करती हैं परवरिश
ये बीत गये उम्र की औरतें रीत जाती हैं घर की घर में

इनकी आँखों के इर्द गिर्द धूप जमा होती हैं
पर ये देखने लगती है पहले से कम

ये नही भूलती अपनी पहली कविता की डायरी
४०० की बाधा दौड़ की ट्रोफी ये नही भूलती अपनी गुडिया
अपना खेल अपने बच्चो के साथ अपने बचपन को दुहराती है
अपने गुड़ियाँ की हंसी देख अपने आप को बिसर जाती है

आग हवा पानी मिटटी से बनी औरते रोज़ देती है चुनौती आग को हवा को पानी को
ये कमाल की औरते जितना बचती हैं उतने से ही रचती है इतिहास
तुम्हारे बॉस के फिरंगी रंगों की औरतों के सामने जब नजर नीची किये तुम बताते हो
ये बस हाउस वाइफ हैं तभी मैं चीख कर कहना चाहती हूँ
जिस बावन रंग के खाने को अभी अभी तुम सब डकार गये
उसके बनाने में मीट गई हूँ खड़ी हूँ एक पैर पर कि खिलाऊं तुम्हारे मेहमानों को एक शानदार डिनर की तरक्की के बेचैन सपनों को मिले विराम

महीने में खून की पट्टियाँ बदलती औरते आदी है दर्द की पट्टियाँ बदल लेती हैं
घूमती धरती पर जम कर खड़ी है तुम्हारी दीवारों में घुली है गारे मिटटी की तरह
तुम्हारे बिस्तर पर तुम्हारी चाह बनकर

और तुम कहते हो कमाल की औरते है
दिन भर घर में पड़ी रहती है.. खाती है मोटाती हैं
शाम को बेहोश पसर जाती हैं
ना कहीं आती हैं ना जाती हैं ...............शैलजा पाठक

Tuesday, February 11, 2014

इमरती मौसी ...

तो कथा यूँ निकली की सूत जी कहते हैं..की आखिरी अध्याय भी मन लगा कर अगर सुन लिया जाए तो भरसक कल्याण ही होता हैं ...

भीड़ के पिछले लाइन में बैठी इमरती मौसी ओघाती सी जाग गई..अब हाथ में अक्षत दूब लिए सजग हो के बैठ गई ..आखिरी अध्याय पूरा सुनना है आज.....

इमरती मौसी के जिनगी में सत्न्रायण भगवान की पूजा का आलम ऐसा की मुहल्ला टोला जहाँ से भी शंख बजने की आवाज सुनी नही की भाग पड़ी साड़ी सम्भारती..आखिरी अध्याय पर मन का मुराद जो पूरा हो जाए की गारंटी ....मौसी के दुःख की कहानी इतनी पुरानी की की बात अब सांत्वना से ज्यादा हंसने की हो गई थी ..मुहल्ले के बच्चे तक चिढाने लगे अरे मौसी बड़का टोला में पूजा शुरू होने वाला है ..कहो मौसी आज आँख खोले रहू की नाही पूजा मा...मौसी आखिरी अध्याय तक जागत रहिया..तोहार मुराद पूरा होई जाई..सूत जी कहत रहें.....पीछे फब्तियां खिलखिलाहटें .....

चकरघिन्नी सी इमरती मौसी दूब अक्षत चुटकी में पकड़े सच पागल के जैसे भागती रही ..घर वापस आते हहरा कर गिर जाती अपनी खटिया पर ..मटमैले तकिया के नीचे से हाल्फ निकर पहनी एक पीली पड़ गई तस्वीर निकालती कलेजे पे ओढती और आँख बंद कर बडबडाती ..बरसोंसे रो रही आँखों में भी पानी ना कम हुआ .

.इकल्ली पड़ी रहती घर में ..तेल मालिश का काम करती....सभी नवजात को ऐसे हसरत से देखती जैसे उनका मुन्ना हो .....इन बेगानी मुस्कराहट में इमरती मौसी ने अपनी जिंदगी तलाश ली थी ..मुहल्ले के सभी सौरी का काम यही संभालती ..टुकुर मुकुर आँखों से निहाल करते से बच्चे ..मौसी की ममता आसमान ...आँचल में तरह तरह का तेल महकता उबटन से आज ही मली गई नन्ही सी बच्ची की कोमल देह बसी सी होती ..मुठ्ठी भर लाल मिर्चा लेकर कभी ई बच्चा कभी उ बचवा का नजर उतरती मौसी निहाल हुई घुमती रहती मुहल्ला मुहल्ला.......

अकेले घर की दीवारों से टिक कर मौसी कलेंडर में टंगे भगवान् को खूब खरी खोटी सुनाती ..छाती सूख गई ..कलेजा मुंह को आ जाता की कैसे पाँच बरस का बेटा गंगा नहाने गई मौसी के आँख झपकते ही ऐसा ओझिल हुआ की कभी ना दिखा ..आह ..

हवा से तेज भागी रही मौसी ...सौ सौ आँख लगाकर चारो तरफ खोजा शीतला मैया के सीढि पर माथा पटकती रही ..जिंदगी का एकही सहारा है मैया रानी..ऐसा नाही कर सकती......कहते हैं उस शाम मौसी की चीख से डरता सा अँधेरा देर से उतरा..गंगा उदास सी बही.... किसी घर से नही आई लोरी की आवाज ..बच्चे चिहुकते रहे .....

मौसी को बेहोशी की हालत में घर लाया गया ..कुछ दिन बीते ..पर दर्द ना बीता.......जमीन पर लाश सी पड़ी रहती है मौसी की ....

आती है शंख की आवाज..अरे बुढा भागो अक्षत दूब लेकर... पूजा शुरू होवेवाला है...तोहार लरिका मिल जाई ......मौसी के अचरा में तेल महक रहा है मौसी भाग रही है ..और मुन्ना...............................अचरा फैला के मांग रही है मौसी अपना मुन्ना...हथेली में चटचटा रहा सत्नारण पूजा का चरणामृत ...
1

Wednesday, February 5, 2014

कमाल की औरतें हैं

.... औरतें भागती गाड़ियों से तेज भागती है 
तेजी से पीछे की ओर भाग रहे पेड़ 
इनके छूट रहे सपनें हैं 
धुंधलाते से पास बुलाते से सर झुका पीछे चले जाते से 
ये हाथ नही बढाती पकड़ने के लिए 
आँखों में भर लेती है जितने समा सकें उतने 

ये भागती हिलती कांपती सी चलती गाडी में ..जैसे परिस्थितियों में जीवन की 

नीकाल लेती है दूध की बोतल ..खंखालती है 
दो चम्मच दूध और आधा चीनी का प्रमाण याद रखती है
गरम ठंढा पानी मिला कर बना लेती है दूध
दूध पिलाते बच्चे को गोद से चिपका ये देख लेती है बाहर भागते से पेड़
इनकी आँखों के कोर भींग जाते हैं फिर सूख भी जाते है झट से

ये सजग सी झटक देती है डोलची पर चढ़ा कीड़ा
भगाती है भिनभिनाती मक्खी मंडराता मछ्छर
तुम्हारी उस नींद वाली मुस्कान के लिए
ये खड़ी रहती है एक पैर पर

तुम्हारी आँख झपकते ही ये धो आती आती है हाथ मुंह
मांज आती है दांत खंघाल आती है दूध की बोतल
निपटा आती है अपने दैनिक कार्य
इन जरा से क्षणों में ये अपनी आँख और अपना आँचल तुम्हारे पास ही छोड़ आती हैं

ये अँधेरे बैग में अपना जादुई हाथ डाल
निकाल लेती है दवाई की पुडिया तुम्हारा झुनझुना
पति के जरुरी कागज़ यात्रा की टिकिट
जिसमे इनका नाम सबसे नीचे दर्ज है

अँधेरी रात में जब निश्चिन्त सो रहे हो तुम
इनकी गोद का बच्चा मुस्काता सा चूस रहा है अपना अंगूठा
ये आँख फाड़ कर बाहर के अँधेरे को टटोलती हैं
जरा सी हथेली बाहर कर बारिश को पकड़ती है
भागते पेड़ों पर टंगे अपने सपनों को झूल जाता देखती हैं
ये चिहुकती हैं बडबडाती है अपने खुले बाल को कस कर बांधती है
तेज भाग रही गाडी की बर्थ नम्बर ५३ की औरत

सारी रात सुखाती रही बच्चे की लंगोट नैपकिन खिडकियों पर बाँध बाँध कर
भागते रहे हरे पेड़ लटक कर झूल गए सपनों की चीख बची रही आँखों में
भींगते आंचल का कोर सूख कर भी नही सूखता
और तुम कहते हो की कमाल की औरतें हैं
ना सोती है ना न सोने देती हैं
रात भर ना जाने क्या क्या खटपटाती हैं ...............

Thursday, January 23, 2014

बाबा का गमछा

बाबा बाहर की चौकी पर ध्यान रमा कर बैठते ..मुझे पता था किसी चौपाई पर नही ठहर रहा है उनका मन ..घर में क्या बन रहा..कौन आया..बातें क्या हो रही हैं...चाय बनी थी क्या फिर से...वो इन बातों का जबाब चाहते ..मैं हूँ ना बाबा बन की तितली.इधर उधर सारी बातों का सामान्य गूढ़ पिटारा..मेरे हाथ हमेशा मिटटी से भरे होते..और बाबा की आँख इंतजार से..मेरे पास जाते ही अपने गमछे का एक हिस्सा चौकी पर मेरे लिए बिछा देते ..

अपनी धोती के कोने से मेरा हाथ पोछते फिर अपनी आँख ..का बाबा ?? एगो गीत गइबे...मैया मोरी मैं नही माखन खायो ..अभिनय के साथ ..बाबा विभोर हो मेरा नादान अभिनय देखते..मैं बताती बाबा जब लाल नीला लाइट पड़ता है ना तब कान्हा का मुकुट खूब चमकता है..स्कूल के स्टेज की बात...पर बिना लाइट बाबा की आँख चमकती..उनके गमछे को कमर में बाँध एक छोटा सा लकड़ी उसमे खोंस जब मैं उनकी तरफ फेंकती..ये लो अपनी लकुटी कमरिया..तब बाबा हाथ फैला देते..ऐन्गा ना रिसियाए के बाबू....अब मुस्कराती चौकी पर बाबा ताली बजा कर मेरे गाने को कसम से बेसुरा गाते..बाबा ऐसे नही ऐसे नही...

गमछे ने बाबा का खूब साथ निभाया..कभी बिस्तर बना कभी पगड़ी..कभी कमर में बंधा कभी सर पर..कभी दाना से भरा कभी सब्जी से कभी हम सोये मिलते उसके नीचे ऊपर बाबा की थपकी..गाँव की मिटटी धीरे धीरे झर चुकी थी ..अब कुछ कहानियां बची थी उनके जेहन में वो भी रूठी सी रास्ता विषय सब भूल जाती ..

हमारे बुजर्गों के पास उनके अनुभव की अकूत सम्पत्ति है ..उनकी कहानियां इस लिए भूल जाती है रास्ता की हम सुनते ही नही कभी बैठकर ..की समय नही.बकबक कौन सुने..वही वही बात...हम भी उसी पटरी से अपने उसी उम्र की गाडी से गुजरेंगे..हवा से कोई पुराना गमछा जो पास उड़ आये तो समेट लेना..उसमे कहानियां हैं.भजन है..बाबा की ताली की आवाज है..मिटटी की महक है..और उनकी आँख की रौशनी है..जो धीरे धीरे बहती थी..जिसे बाबा छुप कर पोंछ लेते थे ....

.एकांत में बाबा ने सुनाई थी घर खेत छप्पर अटीदार पाटीदार की कहानी...आज अपने एकांत के पन्नो पर लिखते हुए समझा मैंने.....
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Monday, December 23, 2013

वही मैं वही तुम ..

दर्द को कूंट रही हूँ 
तकलीफों को पिस रही हूँ 
दाल सी पीली हूँ 
रोटी सी घूम रही हूँ 
गोल गोल 
तुम्हारे बनाये चौके पर 

जले दूध सी चिपकी पड़ी हूँ 
अपने मन के तले में 
अभी मांजने हैं बर्तन 
चुकाना है हिसाब
परदे बदलने हैं
आईना चमकाना है
बिस्तर पर चादर बन जाना है
सीधी करनी है सलवटें

बस पक गई है कविता
परोसती हूँ

घुटनों में सिसकती देह
और वही
चिरपरिचित तुम ...........

Monday, December 9, 2013

लेखक का एकांत

एक मछली थी ...पानी में फडफडाती सी...रेत पर तडफडाती सी ..जरा सी आँख में डबडब पानी .छोटे से पंख से पानी काटती ..फिसल कर संभलती..संभल कर चलती की फांस ली जाती ..दुखी हो जाती...

पानी का ओर छोर नापना था...उस कम्बखत डोर से बचना था ...अब जान बचे ना बचे ..कोई आखिरी इक्षा है तो बता दे ..मछली बोली उड़ना चाहती हूँ ..जंगल के ठीक ऊपर से ..सुना बड़ा घना होता है ..कोई खो जाए तो मिलता नही ..जानवरों से भरा है..अगर है तो ऐसा ..मुझे उड़ने दो...बचा जंगल रोने लगा ..अतीत की जड़ें भिगोने लगा..मछली की आवाज से सब चकित थे...पहले बस चमकती भर थी..जीने भर को जीती थी..अब बोलने भी लगी...

अच्छा एक बार भरी नदी में डूबना है ..नदियाँ रेत में समां गई रेत हवा के साथ उड़ गया...अब ? एक पूरा नीला आसमान ही दिखा दो ...तकलीफों के बादल छाये थे..कहते है दूर देश से पानी लाये थे..किसानों के आँख से बरसे ..पर हरी भरी धरती को तरसे ..किसी और एरिया ने खरीद लिया था उन्हें...मछली उदास हो गई ...

मछली की बिंधी देह से आसमान उतार लिया गया..उसके आँख की नदी में सूख गये सपने..इंसानी जंगल की भीड़ में तुम जानवर बने ..मछली ने बोलना बंद नही किया..सुना बड़े तेवर है..जख्मी हो तो पानी लाल हो जाता है..पर उम्मीदें आसमानी हैं इसकी ...बची हुई मछलियों को कम करने की होड़ में वो अपनी ताकत गँवा रहे हैं..और इंसानियत का नया इतिहास बना रहे हैं....

.एक मछली थी ...अब बिजली से चलती है..कटोरे भर पानी में ...सब मूक दर्शक....मुरझाये पत्तो का एकांत.. बसंत की आस ...

Tuesday, December 3, 2013

लागा झुलनियाँ क धक्का ...

कभी तुमपे कभी हालात पे रोना आया..बात निकली तो हर एक बात पे रोना आया ...

बाभन टोला के छत से आसमान जरा नजदीक दिखाई देता ...बड़ी दूर नाच की आवाज हवा में तैरती सी छत पर रुक जाती..."लागा झुलनियाँ क धक्का बलम कलकत्ता पहुच गए "बुआ देर रात तक जागती दूर से आ रही मध्धिम पड़ती रोशनी की एक डोर उनतक पहुचती..बुआ वही थामे ना जाने कौन दुनियां में विचरती..बुदबुदाती ..अपने लम्बे बालों में कटोरी भर तेल मलती ..और बिखरी सी सो जाती ...

सबकी लाडली रहीं बुआ ..जो मांगती आ जाता ..शहर से आया कपडा सिलाती..ऊँची एडी का चप्पल भी मंगावती शहर से ..नये फैशन का बैग ..और रेशम के पक्के रंगों का धागा... ....अब गाँव में लड़की के बड़े हो जाने का अपना पुराना तर्क हुआ करता ...शादी की सुगबुग पढाई का छुडवा दिया जाना..लड़के की तलाश ..घर का रंगरोगन ..और उस लड़की की विदाई जो अभी चहकती सी आपके आँगन में फर्गुदियाँ सी उछलती कूदती रही ...

बीस साल बड़े रहे अवधेश फूफा ...घर के बड़े ..अपना पक्का घर ..इकलौती संतान ..बड़ी मूंछ..तगड़ी काठी ..और इधर इत्ती सी जान की बुआ ..बिना किसी विरोध शादी हो गई ..बुआ के फ़िल्मी दुनियां वाली ढेरों पत्रिका पड़ी की पड़ी रह गई..जिसमे देखती रही बुआ अपना हीरो सा राजकुमार ...

हम बच्चे थे तब जब आँगन में अपनी पियरी में बुआ शादी के पीढ़े पर बैठी ..आँगन की सारी औरते फुसफुसाती सी कहती रही..बाप सामान दूल्हा खोज लाये बाबा ..घुघट की ओट से बुआ भी अपने दूल्हा को देख सकपका गई थी..बलि का बकरा ..मेरे गाँव की ये सबसे दुखद शादी थी ...जब पहली विदाई पर बुआ ने अपना विरोध जताया ..किसी ने उनकी नही सुनी..अगली साईंत आने तक बुआ चादर तकिया में फूल काढती रही..रोज शंकर जी को जल चढाती रही..कुआँ पर बैठकर घंटों अपनी सखियों को अपना दुखड़ा सुनाती..सारा दिन इधर उधर के घरों में जा के कॉपी भर गाना लिखती रहती..बन्ना बन्नी सोहर कजरी..चैता ..

विदाई का साईंत बन गया तारीख सुना दी ठाकुर मंदिर के पुजारी ने ..बुआ का झांपी सजाया जाने लगा..हल्दी लगाने वाली नाउन रोज़ आने लगी ...बुआ को जैसे बिच्छू घास छू गया...बड़ी बड़ी आँखों में दूर दूर तक सुखा पडा रहता ..गाने की कॉपी में आखिरी पन्नो पर विदाई गीत लिखती बुआ अपने खटिया से लग के रो पड़ती..अम्मा का आँखें क पुतरिया..भैया से जल्दी बुलाने की गुहार ..बाबा से आम का पेड़ मत काटने की मिन्नत करती बुआ.

.बैलगाड़ी पर एक कोने में सिसकती गाँव के उसी रास्ते से विदा हो रही थी..जिसपर अपना दुपट्टा फहराती अपनी सखियों के साथ खेत में मटर तोड़ती..कैरी खाती ..और नचनियां के याद किये गाने पर ठुमका लगाती ..."लागा झूलानिया क धक्का बलम कलकत्ता पहुच गये
'
'..तेज खिलखिलाहट ...तेज रौशनी की किरण..उसकी डोरी थामे बुआ ..सारी रात जागती सी क्या बोलती थी...कोई कभी ना जाना ..बुआ के पेट पर लेटे बैठे हम खेलते रहे घुघुवा मामा उपजे धामा....हम अनजान थे बुआ ..कभी नही समझ पाए ..तुम वो राजा रानी की कहानी में उस बिचारी राजकुमारी का जीकर आते क्यों मन भींगा लेती..वो तुम ही थी ना ??

Sunday, December 1, 2013

लेखक का एकांत

कोई रिश्ता नही मगर फिर भी .......एक तस्वीर लाजमी सी है......

आँखों की नदी ..बाहों की पतवार ..जिंदगी का समन्दर.. ना जाने कितने .भंवर कितने बवंडर ..तुम्हारी चौडी छाती पर टिकी मेरी परेशानियाँ ....

प्यार बंद डब्बे में कपूर सा ...जतन ना करो तो ना जाने कौन सी दिशा में उड़ जाए..बादल बन जाए...हम भींगते हुए भी सूखते रहे ..की पछताती आँखों में एक ग्लानी तैर जाए..ऐसा क्यों किया ??

सुनो आज रात अजीब ख़ामोशी फैली है ना चारो ओर..जरा मेरी पुरानी डायरी देना ....तुम कितने पास ...समय की टिकटिक ..बेफिक्र हवा..पुराने पन्नों से कुछ मीठे वक़्त चुराते हैं..पुरानी कविता पढ़ कर मुस्करा लेते हैं चलो..अच्छा वो आखिरी पन्नों पर तुमने क्या लिखा काटा था..आज तक नही बताया...मेरे उलझते बालों में सुलझती अंगुलियाँ ...

एक छत अतीत हो गई..एक प्यार याद भर..एक डायरी .जिससे होती हुई गुजर जाती हूँ .

.रात बड़ी हो रही ..हर करवट एक सपना बदल जाता है ..पुरानी सूखी पंखुरी का झर झर जाना ...तुम छुईमुई हो..आखिरी पन्ने की मुस्कराहट ...भूला हुआ गाना ...

शाम से आँख में नमी सी है ..आज फिर आपकी कमी सी है........एकांत के बोल ....कभी सुन भी लो ....

Wednesday, November 6, 2013

लेखक का एकांत

अजीब है ना। ।आप खुश हैं कि अचनाक ना जाने कौन से रास्तोँ से चलता हुआ आपका अतीत अचनाक कोहनी मार देता है। .भूल गई क्या ?? हम भी हैं। अब एकांत यूँ भी नही कि आपको एक उदास बुझा हुआ दीया थमा जाए। .पर जो बुझ ही गया मन तो अपने आप को क्यों झुठलाएं अब ऐसा ही है।

और देखो ना फुलझड़ियों से झरने वाला वो चमकदार फूल भी तो अँधेरी सलाखों में कैद हो जाता है तो क्या बचा हाथ में गरमाई हुई काली बेजान तीली। क़ल कि पहनी साड़ी कि तहोँ में यादें सहेज गई। अब रखी रहेगे अलमारी के एक कोने में अगली बार जब पहनेंगे बरबस ही बोल देगा मन पिछली दीवाली को पहनी थी ना। हमे चलते रहना है आगे ..अपनी सोच के साथ नए रास्तों के साथ ..रीती रिवाजों को भी जरा मरा फेर बदल कर निभाते रहना है अतीत कि जुगाली करते रहो कुछ नये स्वाद के साथ बातें याद आती रहती हैं।

कल रात काली थी कितनी ना कि इतनी रोशनी हुई पर मन पर अम्मा छाई रही। वो रात वाला काजल याद आता रहा ..अम्मा कि चुटकियां याद आती रही.. बिना कपूर के काजल के भी लगा आँखे जल रही हैं ..सुबह आईने में आँखें कोरी ही थी ..

अम्मा अब ऐसा तो नही कि अँधेरा साथ ले गई आप हमे बस इन उजालों कि फुलझड़ी थमा दी लो मुस्कराते रहो कुछ बादल पीछे छोड़ गई काला सा जरा सी आँखो में भी भर भर के छायें रहते हैं ...सभी भाई बहनो ने एक दूसरे से एक बात छुपाई कि अम्मा याद आ रही हैं पर सब जान गये और ..पिताजी तुम्हारे कमरे के शुन्य में चुपचाप पुराने हाफ स्वेटर कि वही पुरानी बर्फी वाली डिजाइन को देख कर मीठे हो रहे थे

दीवाली थी न मुह मीठा करना जरुरी है

आसमान के रास्ते हमारे शहर कि सबसे बड़ी खिड़की से मेरी आवाज भागती हुई तुमतक पहुचना चाह रही थी

आपकी आवाज भी आई थी पलट के। खूब घर परिवार सुख से भरल रहे सदा सौभ्यावती का सिंदूर भी चमका हमारी मांग में हाँ हाँ पुराने गहने भी पहने थे हमने तो याद का और तुम्हारा रिशता भी तो ऐसा ही है

पटाखो के तेज़ आवाजों के साथ अपने बच्चोँ का कुनमुनाना तुम देख और सुन सकती हो

बड़ी जिम्मेवारी वाली दीवाली थी जब हम जान गये हैं कि अपनी अंगुली को आग से दीये से कैसे बचाना है अब तुम नही ना हम सब सिख गए

एकांत में टीम टीम करता दीया और मन के फर्श पर तेल सी फैली तुम्हारी याद

Saturday, October 12, 2013

मिलना बिछड़ना कुछ नही होता ....

रास्ते वही होते हैं 
कोई आता है हमारी ओर
कोई बिछड़ जाता है 

खाली भरम 
सारे रास्ते भाग रहे हैं 
तुम्हें इधर मुझे उधर 
पहुचाने के होड़ में 

हमारे मिलने के आभास भर से 
शहर में कुछ कुछ दूर पर बिछी है हरे घास वाली बगिया
झूठा ही सही पानी का रंगीन फुहार भी
झलमलाता है हमारे लिए

उस चौक का पुलिस वाला देखो ना कितनी बार
रोक देता है गाड़ियों का काफिला की हम
पार हो जाएँ

कितनी ही बार वो लाल फूल बेचने वाला बच्चा
तुहें थमा देता है
महकते फूलों का गुच्छा तुम मुस्कराते हो
लाल फूलों में मेरे होठ छूते हुए

देखा अभी अभी मिले हम ...

ठंठे पानी के छीटें में भी
मैं अपने रुमाल में बूंद बूंद समों लेती हूँ तुम्हें
तुम्हें सोचना ही मिलना है तुमसे

देर तक डायरी के खाली पन्ने पर
रेगतीं हूँ इधर उधर और कुछ नही लिख कर भी
मुस्कराती हूँ

मिलने बिछड़ने की सोच में भाग रहीं है सड़कें
ये लो तुमसे मिल कर बिछड़ गई
पर आँखें बंद करते ही
एक नीली नदी में डूब जायेंगे हम ..

नदियों में आई बाढ़ सा मौसम ..उतराता डूबता सा ....

.शैलजा पाठक

Monday, October 7, 2013

करीमा...माफ़ कर दे

चलिए करीमा के साथ... हमारे ही गाँव के उत्तर में उसका घर है ..घर क्या चार जर्जर दिवारों का एक ढांचा ...उसी में रहता है करीमा ..और सच जानिये तो रहता ही कहाँ है ...सारा दिन तो गाँव के लोगों की सेवा टहल में बीत जाता है समय ...मुंह अँधेरे घास की मशीन से चर्र मर्र की आवाजों के साथ उसका आगमन हो जाता है ....

पर कहानी बस हम तक सिमित है ..करीमा हमारे लिए जादूगर था ..उसके पास तरह तरह के गाने थे ..हमरा के जानी ना सिपाही जी ...ए दुल्हिन सपना में केकरा से भेटेलु......और हम सब का फेवरेट गाना ...ए डागदर बाबू बेमार भैल बकरी ...बस इस गाने को गाते गाते करीमा गाँव के अहर डहर के रास्ते हमें पूरा गाँव घुमाता..हम पूरी भक्ति से उसके पीछे ये गाना जोर जोर से गाते ..बगीचे की सबसे ऊँची डाली पर पत्तो के पीछे छुपा है एक पका आम करीम सरपट ऊपर ..हमारे मुंह में आम के रस निचोड़ता..हमारी पेंसिल को अपने पास रखे तेज छुरी से एकदम नुकीला बना देता ..हमारी चोटी कस के बाँध देता ..जल्दी से सबके हाथ मुंह धुला देता .

.तब कुवें पर बाल्टी डोरी सब आने जाने वालों का प्यास बुझाती ...एक लोटा में मुंह लगा कर जोर से अपना नाम गोहराता..हमें बताता सौ सौ लोगों की आवाजें पुकारती हैं उसे पलट कर ...सब जादू ना करीमा ?चाची लोगों की सतरंगी टिकुली के लिए वही लाता गोंद ना जाने कौन से पेड़ से इकठ्ठा कर के ....बाबा के गमछे को धोती को इस पेड़ से उस पेड़ में बांधकर पल भर में सुखा लाता..जादू ना करीमा?

पर गाँव के चौपाल पर जब बच्चा चाचा निर्गुण गाते करीमा रो रो के हलकान हुआ जाता ..जब रामायण के बनवास को पंडित जी बांचते करीमा बेचैन हो जाता ....हमे तो कभी ना समझ में आया करीमा की जिंदगी में कोई तकलीफ भी है ..हमेशा दूसरों के लिए काम करते रहने वाला करीमा अनाथ है ..बाबा ने बताया ..माँ बाप बचपने में ही मर गये ..छोटा जात ..इधर उधर काम टहल करते रहता है ...उसके एकांत की पगडंडियों पर हमारा बचपन भागता था ..हमारी आवाजों की पुकार में वो सारे रिश्ते जी लेता .

.अब देर रात अपने घर की दीवारों के बीच अजोरिया रात में वो अपने पैरों में पड़ी दरारों को मोम से भरता ...ना जाने कितनी चाचियों ने सटा के लगा ली अपनी टिकुली ..बच्चों ने जोर जोर से गाये उसके गाने ..घास की चर्र मर्र के अलार्म से उठा करती नई दुलहिनें ...कोहड़ा के लतर सा छाया रहा करीमा बाबा के खपरैल पर ...एकदम से उसके मरने की खबर आई ..गाँव के उत्तर टोला के कुवां में लाश मिली ..करीमा था ....

मुझे लगा मैं जानती थी उसके मरने का कारण ..पहले क्यों ना बता दिया ...ये कैसा अपराधबोध दे गया करीमा ..तू कुवां पर रात काहे गया मुझे पता है ...तूने अपने नाम की आवाज लगाईं ना ..और उन हज़ार हज़ार आवाजों ने पलट कर तुझे पुकारा ..तू चला गया उनके पास .....

किनारे एक लोटा लुढका पड़ा हवा से इधर उधर डोल रहा है ..अन्दर से चीख पुकार मची है ..अकेलापन अकेले ही मारता है हमें ..अनजान आवाजों में अपनों की खोज ..समय इशारे क्यों नही करता ?? करीमा तू जादूगर नही था .................माफ़ कर दे ...

मुंह में उसी मीठे आम की चट चट ..एकांत की कहानी ...

Monday, August 26, 2013

बहनें ...दो कविता

१

कुछ कतरनों में हमनें भी सहेजी है 
नैहर की थाती 

हमारे बक्से के तले में बिछी
अम्मा की पुरानी साड़ी 
उसके नीचे रखी है पिताजी की वो तमाम चिठ्ठियाँ 
जो शादी के ठीक बाद हर हफ्ते लिखी थी 

दो तीन चादी का सिक्का जिसपर बने भगवान् की सूरत उतनी नही उभरती 
जीतनी उस पल की जब अपनी पहली कमाई से खरीद कर 
भाई ने धीरे से हाथ में पकड़ा दिया ये कह कर
बस इतना ही अभी

तुम्हें नही पता तुम्हारा इतना ही कितना बड़ा होता है की
भर जाती है हमारी तिजोरी

की अकड़ते रहते हैं हम अपने समृध्ध घर में ये कहते
भैया ने बोला ये दिला देंगे वो दिला देंगे

हद तो ये भी की भाभी के दिए एक मुठ्ठी अनाज को ही
अपने घरों के बड़े छोटे डिब्बों में डालते ये कह कर की जब तक
नैहर का चावल साथ है ना
हमारे घर में किसी चीज़ की कमी नही ...

किसी को ये सुन कर बुरा लगता है की
परवाह किये बगैर

पुरानी ब्लैक न वाइट फोटो में हमारे साथ साथ वाली फोटो है ना
सच वो समय की सबसे रगीन यादों के दिन थे

हाँ पर अम्मा की गोद में तुम बैठे हो
हम आस पास खड़े मुस्करा रहे हैं
हमे हमेशा तैयार जो रखा गया दूर भेजने के लिए

अच्छा वो मोटे काजल और नहाने वाली तुम्हारी फोटो देखकर
तुम्हें चिढाने में कितना मजा आता
तुम्हारी सबसे ज्यादा फोटो है की शिकायत कभी नही की हमने
हमारे लिए तुम्हेई सबसे ज्यादा रहे हमेशा

अब तुम बड़े हो गये हो
तुम्हारे चौड़े कंधे और चौड़ी छाती में
हम चिपक जाती हैं तितलयों की तरह
एक रंग छोड़कर उड़ जाना है दूर देश

कभी आ जाओ न अचानक ..बिना दस्तक दरवाजा खोल दूंगी ..तुम्हारी आहटों को जीया हैं हमने .... 


आज आ जाओ ...आ सको तो ...

२ 


बहनें हमेशा हार जाती है 
की खुश हो जाओ तुम 
जबकि उन्हें पता है जीत सकती हैं वो भी 

अजीब होती है... बड़ी हो जाती है तुमसे पहले 
अपने फ्रॉक से पोछ देती है तुम्हारे पानी का गिलास 
तुम पढ़ रहे हो ..भींग जाता है तुम्हारा हाथ 
पन्ने चिपक जाते हैं 

तुम कितनी भी रात घर वापस आओ 
ये जागती मिलती हैं
दबे पाँव रखती है तुम्हारा खाना
तुम्हारे बिस्तर पर डाल देती हैं आज का धुला चादर
इशारे से बताती हैं ..अम्मा पूछ रही थी तुम्हें
काहे जल्दी नही आ जाते ..परेशान रहते हैं सब

बहनें तुम्हारी जासूस होती हैं ..बड़ी प्यारी एजेंट भी
माँ भी ..की इनकी गोद में सर धरे सुस्ता लो पल भर

बहनें तुम्हारे आँगन की तुलसी होती हैं
तुम्हारे क्यारी का मोंगरा
बड़े गेट के पास वाली रातरानी
आँगन के उपेक्षित मुंडेर की चिड़िया होती है भैया
पुराने दाने चुगते हुए तुम्हारे नए घरों का आशीष देती हैं

हमारी आँखों के कोर पर ठहरे रहते हो तुम
हम जतन से रखती हैं तुम्हें

बहनें ऐसी ही होती हैं ....

Saturday, July 27, 2013

वो दूर होने से डरते हैं ....

पास की नजर ख़राब है 
समाचार पत्र को आँख के 
पास ला के देखते है 
पढ़ते हैं शायद 

मुझे लगा अब वो चीजों को 
दूर करने से डरते हैं 
जैसे पास ही रखे स्टूल को खीचते है बार बार 
बार बार दवाइयों की ख़तम होती पन्नी को 
देखते हैं दबा दबा कर 

अब नही हटती मच्छरदानी कभी चौकी से
एक तरफ से उठा रहता है परदा
फिर भी जाली जाली सा दिखता है
लगा मुझे मलते हैं आँख और भुनभुनाते से हैं

सिरहाने रखे बचे पैसों को
बेचैन होकर गिनते है
जमीन पर गिर पड़े सिक्के को
आवाज के साथ नाचते हुए देखते हैं
फिर खीच सरका के लाते हैं पास

वो पास खीच लाना चाहते हैं
अपने बेटे की आवाज
अपनी बहू की फिकर
अपने पोता पोतियों के खिलौने

अब वो दिवार के बहुत पास हैं
सुनते है आहटों को जो दूर होती जा रही हैं
जमीन के पास है पैर धंसा के चलते से
उदास एकांत की सीटियों से कांपते है

अब आसमान ताकते हैं
आजकल वो अपने आसपास ही रहते हैं

हाँ भाई वो दूर होने से बड़ा डरते हैं ....

Thursday, July 4, 2013

खूंटे से बंधा आसमान

भींगे गत्ते से 
बुझे चूल्हे 
को हांकती 
टकटकी लगाये ताकती 
धूवें में आग की आस 

जनम जनम से बैठी रही इया 
पीढ़े के ऊपर 
उभरी किलों से भी बच के निकल 
जाती है 

धीमी सुलगती लकड़ियों में
आग का होना पहचानती है
हमारी गरम रोटियों में
घी सी चुपड जाने वाली इया

घर की चारदीवारी में चार धाम का पुण्य कमाती
भींगे गत्ते को सुखाती
हमेशा बचाती रहीं
हवा पानी आग माटी
और अपने खूटे में बंधा आकाश ....

Monday, June 17, 2013

तुम्हारे लिए भाई

उदास हो ?पता चल गया
तुम्हारी आवाज का बेगानापन
सब बता गया मुझे

ये छोटे भाई का उदास होना बड़ा अखरता है
सबके हिस्से का प्यार लेकर बड़े होते हैं ये
इनके जनम का महिना और तारिख जीतनी याद नही
उतना याद है उस साल देश दुनियां में होने वाली हलचल
घर में बातें ही ऐसे होती रहती

जिस बरस पैदा हुए थे तुम घर की आमदनी बढ़ी
रागिनी बुवा की शादी का साल था
सात साल बाद उस बरस खूब बारिश हुई थी
बाबा की पछिम टोला की बंजर जमीं पर धान की ओढ़नी फैली थी
अरे हाँ उसी साल घर में आई थी ना टी वी
जैसे तुम्हारे नही होने से रह जाती ये सारी घटनाएँ
वो आगे वाला नया कमरा भी उसी साल बना था भाई
अग्रेजी स्कूल में गये तुम सबसे महंगा बैग था तुम्हारा
तुम्हारे काले जूते को चमकाते और.. वो मांग निकाल कर तुम्हारा बाल बनाते हम
तुम्हारी धूरी पर तो थी घर की खुशियाँ

दुनियां कितनी भी बेरहम हो जाए
तुम्हारे लिए सबके प्यार की छाँव है ठौर है
सर्दियाँ छू ना पाए तुम्हें अम्मा ने तुम्हारे लिए
गरम कपड़ों में धूप सहेजी
घर के चौरे में हरियाली ..अपने आँखों में नदी
और अपने आँचल में अकूत प्यार

मायूसी और उदासी के बीच ही वो प्यार के मोती चमकते है
अब मुस्करा भी दो ..चलो उस तालाब के पास चलो
मैंने कागज की नाव बनानी सीख ली है
सच तुम्हारे रखे पत्थर का भी वजन उठा कर चलेगी
मैं बहती धारा में दूर बह जाउंगी पर जब पिछे देखूं तो तुम
ताली बजाते हँसते हुए दिखना..मंजूर ना ?
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Friday, June 14, 2013

गाँव के रंग ...

गाँव में पुआल 
बचपन ..धमाल 

पुवाल वाला घर 
लुटे हुए आम ..गढ़ही में गिरा ..सुग्गा का खाया 
पत्थर से तोडा की निहोरा से मिला 
पकाए जाते थे 
पर अक्सर पकने के पहले 
खाए जाते थे 

अक्सर पुवाल घर में मिलती थी
नैकी दुल्हल की लाल चूड़ियाँ टूटी हुई
और बिखरी होती थी
दबी खिलखिलाहटें

पुवाल से हम बनाते थे
दाढ़ी मूंछ हनुमान की पूँछ
दुल्हे की मौरी
कनिया की चूड़ी

पुवाल से भरी बैलगाड़ी पर
हम चढ़के गाते थे
हिंदी सिनेमा का गीत
दुनियां में हम आये है तो .....

उस घर के छोटे झरोखे से
दुलहिनें देखती थी हरा भरा खेत
उनके नैहर जाने वाली पगडण्डी
सत्ती माता का लाल पताका और धूल वाला बवंडर

अचानक पुवाल घर को छोड़कर
हम पक्के रस्ते से शहर आ गए

आज भी यादों की पुवाल में पकता है
बतसवा आम ..चटकती ही मुस्कराती चूड़ी
सिनेमा के गाने बदल गए गाँव भी बदल गया बाबा
पर बादल बरसते हैं तो माटी की महक से हुलस जाता है मन
नन्हके पागल ने लगा दी है बचे हुए पुवाल में आग

शहर के आसमान पर वही गाँव वाला बादल छाया है बाबा
अभी अभी हम दोनों की आँख मिली
और बरस पड़े .....

Saturday, June 8, 2013

आदमखोर

एक ऐसा राक्षस 
जो शरीर के बोटी बोटी से 
अपना हिस्सा लेता 

जो बेटी की छाती पर चढ़ कर
छिन लेता उसके पसीने की कमाई 

जो बेटे को बात बेबात लात मारता 
उसके जरा से हाथ में पकडाता कुदाल फावड़ा 

जो गालियों को ऐसे निकालता
जैसे साँसें हों उसकी

वो जो बंद कमरे में बलात्कार करता
अपने पिलिया से पिडित औरत के साथ

वो जिसके कपड़ो से गंध आती
वहशीपने की

जो रातों की रगें दुखाता
जो नदियों को खारा कर देता

वो अपने आदमी होने पर अकड़ता

इंसानों की बस्ती में कुछ आदम खोर आदमी भी हैं
और सुना तेजी से बढ़ रही है इनकी संख्या .......

Friday, May 31, 2013

मेरी चोटी में बंधे फूल ..

तुमने मुझे बेंच दिया 
खरीदार भी तुम ही थे 
अलग चेहरे में 

उसने नही देखीं मेरी कलाइयों की चूड़ियाँ
माथे की बिंदी .मांग का सिंदूर 
उसने गोरे जिसम पर काली करतूतें लिखीं 
उसने अँधेरे को और काला किया... काँटों के बिस्तर पर 
तितली के सारे रंग को क्षत बिछत हो गये 

तुमने आज ही अपनी तिजोरी में
नोटों की तमाम गड्डियां जोड़ी हैं
खनकती है लक्ष्मी
मेरी चूड़ियों की तरह

चूड़ियों के टूटने से जखमी होती है कलाई
धुल चूका है आँख का काजल
अँधेरे बिस्तर पर रोज़ बदल जाती है परछाईयां
एक दर्द निष्प्राण करता है मुझे

तुम्हारी ऊँची दीवारों पर
मेरी कराहती सिसकियाँ रेंगती है
पर एक ऊँचाई तक पहुँच कर फ्रेम हो जाती है मेरी तस्वीर
जिसमे मैंने नवलखा पहना है

खूंटे से बंधे बछड़े सी टूट जाउंगी एक दिन
बाबा की गाय रंभाती है तो दूर बगीचे में गुम हुई बछिया भाग आती है उसके पास
मैं भी भागुंगी गाँव की उस पगडण्डी पर
जहाँ मेरी दो चोटियों में बंधा मेरे लाल फीते का फूल
ऊपर को मुह उठाये सूरज से नजरें मिलाता है .......

Saturday, May 25, 2013

.लेखक का एकांत _14

का खाऊ का पिऊ का ले परदेश जाऊ ....हम कितने डूब कर सुनते ये कहानी ..मुँह खोल कर ..जब कहानी जंगल से गुजरती हम अपनी मुट्ठी भींच लेते ..और जब राजकुमार आता ..हम सरक कर अम्मा के पेट से चिपक जाते ..राजकुमार 

अपने सफ़ेद घोड़े पर सवार हो धूल उडाता चला जाता ..हम आँखें मल कर उसके सुन्दर रूप को देखते ..अब कहानी में एक लड़की होती ..हम अपनी फ्राक में रखी लाइ को खाते खाते रुक जाते ..हाँ अम्मा फिर क्या ?उसकी सौतेली माँ

बहुत सताती ..बर्तन माजना ..पुरे घर का कपड़ा धोना ..भूखे सो जाना ..हमारी गौरैया सी आँखों में मोटे आंसू आ जाते ..अम्मा अपने पेट पर लेटा लेती ..सहलाती ..कहानी है बाबु ..फिर एक माली की लड़की पर राजा का मन आ गया पर लड़की का मन ?.....कौन पूछता है ...क्यों नही पूछता ?अम्मा चुप लगा जाती ..दिवार पर जाला लगा है कल साफ़ करना होगा बडबड़ाती....हम मछरदानी में घुस आये मछर मारते ...हाँ अब आगे ...फिर क्या ..अच्छा वो सात भाई वाली कहानी अम्मा ...हाँ हाँ जब सातवां भाई अपनी चिरई सी बहन को अपनी जांघ चिर कर छुपा लेता ..बाप रे .हम अपने भाई का मुंह ताकते..वो इशारे से कहता सब कहानी है ..कोई ऐसा नही करने वाला ..और हमारी चोटी खिंच लेता ...अब दूसरी कहानी में सौतेली माँ भाई बहन दोनों को कटवा कर जंगल में फेंकवा देती ...हमारी आँख बड़ी खुल जाती ...अब भाई बहन बेला चमेली बन जाते ..हम एक दुसरे के को जोर से पकडे होते ..कहानी के दुःख ने हमे दुखी किया ...प्यार ने करीब ..अम्मा किअतानी ही बातें ऐसी कह जाती जिनके अर्थ बाद में खुलने लगे ..जैसे रजवाड़े में व्याही लड़की का अकेलापन ..जैसे आम के बगीचे में भागती हवा का पिंजरा ..भाई के दूर होने दर्द ..ससुराल जाने वाली लाल चिरैया की कहानी ..कम पढ़ी लिखी अम्मा ने ही हाथ पकड़ कर क की कवायद सिखाई थी ..आम में पीला रंग भरा था ..आँखों में आकाश भी ..काले काजल का बादल भी ..संवेदना की नदी भी ...

यही माटी मे शरीर माटी होए वाला बा सबकर .... ..तुम माटी बन गई राख बन उड़ गई नदी बन बह चली कही और किसी और जगह ..पता है होगी कही ..चारो बगल बच्चों को बैठा कर ..तार काटो तरकुल काटो ..की मामा हो मामा चीटिया क झगडा ..वाला खेल खेल रही होगी ..मेरा बेटा मेरे बगल में खेल रहा है ..दिवारों पर बहुत गहरा जाला है ..या की दिख नही रहा कुछ साफ़ साफ़ ...तुम कहानी बन गई ना ...

लेखक का एकांत _13

मैं तुमसे मिलना ही नही चाहती के तेवर को तुम समझते और नही आउंगी के सच को झुठलाती दिन के सबसे गरम समय में पैर पटकती उस उपेक्छित तालब की सीढियाँ उतर जाती ..तुम्हारी आँख की मुस्कराहट पानी में खिले एक्का दुक्का उन कमल के फूलों को कुछ और गहरे रंग जाती ..हाँ बोलो क्या बोलना है ? कुछ नही में वो सर हिला देता ..पता था ..नही आउंगी बोल कर मैं आ जाउंगी..कुछ नही बोलना है की चुप्पी को तोड़ने के लिए फिर मैं बात भी करुँगी...तुम्हारे इशारे में तुम्हारी कहानियाँ छुपी होती ..लाल आँखों में गई रात नींद नही आने की शिकायत ..पढ़ाई नही हो पा रही है के शिकन से तुम्हारे माथे पर पड़ता बल ..तुम्हारे चुप रहने से मैं बातें करती ढेरों तमाम ..तुम हाँ हूँ कर सब सुनते ..मेरे कलाई में पड़ी उस लोहे की चूड़ी को घुमाते रहते .

.तालाब का पानी इतना गरम की हाथ सिंक जाए .फिर भी उन बैगनी कमल के फूल की मुस्कराहट को नही चुराता कोई ..हम जितनी देर वहां होते सूखे पत्ते गिरते तेज हवा से तालाब के पानी पर झुर्रियां सी पड़ जाती ...हमें मौसम सिखाते हैं ..वो मेरी गुलाबी हथेलियों को अपने रूखे हाथो में कुछ देर पकड़ कर रखता ..मन के अन्दर के मौसम के बदल जाने का समय होता वो ..तुझे तेज धूप में आना पड़ता है ना मेरे लिए ..गाल तप से जाते ...हाँ तो..अब आगे से नही आउंगी ...बहोत गरमी है ..वो अपने कमीज के निचे रखी एक किताब निकाल कर मुझे देता ..तुम्हारे लिए ....आज ही लाइब्रेरी से ली चार दिन बाद लौटना होगा ...हम्म ..तो चार दिन बाद फिर आउंगी मैं यही ना ..चा..र ....दि.न ...आ जाना ना ................(झुलसाती गरमी में चन्दन सी यादें .. )