Tuesday, May 21, 2013

एकांत में अतीत _12

जब साडी पहननी नही आती तो पहनी क्यों ?मैंने फिसलते प्लेट्स को मचोड कर खोस लिया ..काम वाली बाई भी इससे अच्छा पहन ले ..मेरी निगाहें नीची ..ट्रेन भाग रही थी ..वातानुकूलित डिब्बे में आवाज कम आती है ..मैंने पहली बार उस डिब्बे को अपनी खुली आँखों से अन्दर बैठ कर देखा ..जब हम बच्चे थे तब कैंट सटेशन पर अपनी सादा लाल गाडी का इन्तजार करते हुए जब कभी ये शीशे बंद डिब्बे हमारे सामने रुकते हम उचक कर देखते .कुछ नही दिखता सा दिख जाता ..अम्मा बताती वो विदेशी लोग जाते है ..आज मुझे पहली बार एक विदेशी के साथ उसी बंद डब्बे में बैठाकर भेजा जा रहा है ..बम्बई ..फोटो में देखा था ..सिकुड़ कर एक कोने में हो ली थी ..लम्बे बालों का हेयर बैंड बार बार खुल जाता ..चटक लाल सिंदूर से भरे मांग को वहां लगे शीशे में देखना बड़ा अलग सा लग रहा था ..पर बार बार निहारूंगी तो क्या कहेंगे सब ..फिर मुहं गाड लिया और कादम्बनी देखने लगी ..उल्ट पलट ..हाथ को बार बार खिड़की के शीशे पर रखती ..कोई उपाय नही ..हवा से हाथ नही लड़ा सकती अब..पुड़ी भुजिया खाने की जगह केटरिग से खाना आया ..मुझे आता था खाना खाना पर उस दिन सब गड़बड़ हो रहा था ..पति ने परदा लगा दिया ..बाबा रे ..परदा ट्रेन में ..अब ससुर ने तौलिया बिछा दिया ..मैं लल्लू की तरह सब बात मान रही थी .

.पहली बार मुझे लगा दिमाग नही मेरे पास..मेरा सञ्चालन अब मैं नही कर रही ..बस सांस लेने का काम मेरा ..हे प्रभू ..पांच मीटर की साडी ..अरे कम्बखतों ..कोई तो पुराने कपडे रख देता की बदल लेती ..ये सफ़र बड़ी मुश्किलों से तय हुआ ..और तय ये भी हुआ की मुझे अकेला ना छोड़ा जाए की मैं इधर उधर टहल न लूँ..और कुछ सलवार कुरता खरीद दिया जाए ..दूसरा निर्णय सही था ..अब मैं बम्बई..महानगरी से ...पूरा बम्बई स्टेशन मुझे लेने आया था क्या ..नही नही लोकल की भीड़ है ..मेरी सिड्रेला वाली चप्पल को बर्थ के बड़े निचे से निकालते हुए पति ने घूर के देखा मैं बिछिया ठीक करने लगी ..हाँ तो कई लोग आये थे ..बड़े लोगों के यहाँ के रिवाज में मैं नहा रही थी ..हाई भाभी ..यु आर सो स्वीट ..आसमानी पप्पी और झप्पी ...किसी तरह से इन आतताइयों से छूट कर मुझे कुछ कपडे दिलाते हुए मुझे अपने घर में लाया गया ..ससुर ने कहा मोस्ट वेलकम ..ये अग्रेजी कुछ देर और चली न तो मैं चल दूंगी ..मन में सोचा .

.घर में सभी सामन अपनी जगह पर रखा गया मुझे भी ऐसा करने को कहा गया ..इधर चप्पल..इधर पर्स इधर कपडे ..ये बाथरूम ये रसोई ये बेड रूम यहाँ चाभी रखी जाती है ..उस बंद डिब्बे में विदेशी जाते हैं ..अब मैं बहुत दूर आ गई ..गला भरने लगा ..कहाँ जा कर रो लूँ ..लडकियां कितनी सहज होती है ना जिस माटी में २० साल खेली पलीं बढीं उन्हें जड़ समेत कही और रोप दिया जाता है ..नए बीजों का माटी में खो जाने का जी करता है ..पर नइ उम्मीद नए प्यार के छीटों से वो फिर गहरे जड़ बना लेती हैं ....उनकी उदासियाँ बड़ी बेआवाज होती है ..समझो उन्हें भी ..बंद शीशे के विदेशी डिब्बे से तुमने मुझे बड़ी दूर भेज दिया भाई ..हमारे बचपन की हथेलियों के छापे दिखाई देते है इसपर .जो हम उचक कर लगाते थे ..मैं इसमें जब भी बैठती हूँ सबकी आँखें बचा कर तुम्हारे खाली हाथ पर अपने हाथ रख देती हूँ ...

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